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Curriculum is that which the pupil is taught. It involves more than the act of learning and quiet study. It also involves occupations, productions, achievement, exercise, and activity. In the sense, curriculum is the path through which the student has to go forward in order to reach the goal envisaged by education. Usually the term curriculum is understood as a group of subject prescribed for study in a particular course. Thus, the term curriculum in recent years has come to mean all the planned activities and experiences available to the student under the direction of the school. Curriculum is dynamic


Education, if looked at beyond its conventional boundaries, forms the very essence of all our actions. What we do is what we know and have learned, either through instructions or through observation and assimilation. When we are not making an effort to learn, our mind is always processing new information or trying to analyze the similarities as well as the tiny nuances within the context which makes the topic stand out or seem different. If that is the case then the mind definitely holds the potential to learn more, however, it is us who stop ourselves from expanding the horizons


Information Technology: Information Technology is a developing technology that aims at obtaining the maximum information with minimum of resources, labour or time. Information technology is defined as the study, design, development, implementation and the management of computer based information systems. This entails the study of computer software applications as well as computer hardware. With the advent of electronic computers, information technology is used covert, store, process, retrieve, protect, and transmit information to various sources. From obscurity, information technology has become an everyday term that has encompassed computing and technology. Therefore IT is a wide term and it involves use in


India has a long and ancient mathematical tradition. The texts for the construction contain a lot of geometrical results. Thus statement of the Pythagoras Theorem, an approximate value of ‘pi' i.e. the ratio of the circumference of a circle to its diameter came into existence. The decimal place value system and the number ‘zero’, was given by India to the world.

Mathematical career has been regarded as synonymous with a teaching career. The situation in general is that those who fail to join professional courses leading to gainful employment come to research as a last resort.

In reality the situation


This is the era of competition, but too much pressure cause degradation in growth. The formula "Compete or Die" makes student nervous and tense. Students can not explore their interest because of nervousness.  Students are also pressurized to score good marks which is usually 90% marks. If a student scores less than 90% then he didn't get good value of his hard work. Every student has his own capacity to learn and to know and to analysis the knowledge but student should never be pressurized on the same. Parents expect that his son/daughter will score a minimum of 90%. This


Education is the one that doing something constructive in our near future. It helps a person to show their best by their mind and spirit. It gives you a lot of knowledge in whatever aspects. The more you have knowledge the more you grow. Being educated and earning a professional degree prepares you to be a part in reputed organizations, companies or institutions.

There is a special need today for evolving a new system of education in India which must be in tune with our major values of national tradition and integration. This system can only nourish and strengthen our

स्वच्छता से प्रबंधन की सीख

सामाजिक और धार्मिक कार्यो के पुरोधा शहर का नम्बर एक आना आश्चर्य का विषय नहीं है बिल्कुल भी नहीं क्योंकि हमारी तासीर में कुछ अलग करने का जज्बा कूट कूट कर भरा है। हमें देश भले ही खाना पान और मालवी तहजीब के लिए जानता हो पर इस शहर की असल ताकत यहां के लोग है ऐसे लोग जिन्हें इंदौरी कहलाने पर नाज है और इसकी खातिर वे किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते है। स्वच्छता और मेरा शहर स्वच्छ कहलाए जाए इसका जुनून था शहर में...हो हल्ला करते हुए कचरा इकठ्ठा करने वाली गाडियां जब शहर की

विश्वास तो करके देखो

आधुनिक युग है और इसी के अनुसार जमाने की चाल भी बदल रही है। मनोरंजन के साधन बदल गए और रिश्ते-नातों के मायने भी बदल गए। संबंधों की गरमाहट अब उतनी गुनगुनी नहीं लगती और दिखावे का जैसे बोलबाला है। ऐसी परिस्थितियों में परिवार का भविष्य सभी सदस्यों के दृष्टिकोण से कैसा होगा, इस पर खुली बहस करना भी मुश्किल होता जा रहा है। खासतौर पर युवाओं के दृष्टिकोण से। युवा साथी चाहते हैं अपनी तरह से जिंदगी जीना और निश्चित रूप से इसमें परिवार भी शामिल रहता है। परंतु सामाजिक माहौल ऐसा हो गया कि परिवार यह समझकर ही

खुद को सँभालना सीखें

जिंदगी में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं, जब व्यक्ति हताश हो जाता है। जिंदगी बोझिल लगने लगती है और कुछ भी अच्छा नहीं लगता। यह ऐसा समय होता है, जब दोस्तों के साथ पार्टी में भी जाने का मन नहीं करता। असफलता हो निजी जिंदगी के रिश्तों की या स्वयं की असफलता के कारण ऐसा हो जाता है।

यह जिंदगी का महत्वपूर्ण समय होता है, जिसमें व्यक्ति का संपूर्ण करियर निर्भर करता है फिर वह नौकरी कर रहा हो या पढ़ाई। विपरीत परिस्थतियों को मात देना और साथ में स्वयं को भी संभालना न केवल थोड़ा मुश्किल

मेरी संस्कृति मेरी शिक्षण पद्धति

अपनी संस्कृति और आधुनिकता के बीच फंसे पालक
- बच्चों में आ रहे हैं अप्रत्याशित सामाजिक बदलाव
ुनिकता और संस्कृति में मेल नहीं बैठा पा रहे
- बड़े स्कूलों के बड़े तामझाम से मोह भंग 
-यर कॉन्वेंट की नई पहल
अपनी संस्कृति और आधुनिकता के बीच फंसे पालक
- बच्चों में आ रहे हैं अप्रत्याशित सामाजिक बदलाव
- आधुनिकता और संस्कृति में मेल नहीं बैठा पा रहे
- बड़े स्कूलों के बड़े तामझाम से मोह भंग 
- पायोनियर कॉन्वेंट की नई पहल
इंदौर। माता-पिता बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए तमाम तरह के प्रयास करते हैं। इसमें बेहतरीन शिक्षण सुविधाओं से लेकर तमाम तरह की सुखों को वे अपने बच्चों को कम उम्र में देना आरंभ कर देते हैं। उद्देश्य एक ही है कि बच्चा अच्छा पढ़-लिख जाए और अपना अच्छा भविष्य बनाए। परंतु इस सोच में पैसे से सब कुछ देने की भावनाएं बलवती होती जा रही हैं जिसके कारण बच्चे न केवल माता-पिता से दूर होते जा रहे हैं बल्कि भटकाव औरअवसाद के शिकार भी हो रहे हैं। आधुनिक दौर में माता-पिता दोनों ही नौकरी करते हैं और पैसा इसलिए कमाते है ताकि बच्चों को सुरक्षित भविष्य दे सकें। इसके लिए पैसे कमाने की दौड़ में वे तेज गति से भाग रहे हैं पर पीछे छूट रहा है बच्चों से प्रेम और साथ जिसे वे विभिन्न क्लासेस के माध्यम से पूर्ण करने का प्रयास करते हैं। बच्चे नाराज न हों इसके लिए कुछ भी करते हैं। माता-पिता बच्चों से दूर रहते है और बच्चे अपनी जिद मनवाने के लिए किसी भी हद तक जाते हैं। बच्चों से डरे माता-पिता बच्चों की हर इच्छा पूर्ण करते हैं जिसमें मोबाईल से लेकर टेलीविजन तक शामिल हैं। 
पार्टी के लिए हजारों रुपए
पार्टी कल्चर के कारण आजकल पांचवी से आठवीं तक के बच्चे पार्टी मनाने के लिए हजारों रुपए खर्च कर देते हैं। खुद का बर्थडे हो या फिर दोस्त का बर्थ डे वे होटलों में हजारों रुपए खर्च करते हैं और ना सुनने की उन्हें आदत ही नहीं क्योंकि माता-पिता ही बच्चों से डरे हुए हैं। पार्टी कल्चर के कारण बच्चे महंगे गिफ्ट देने के आदि हो गए हैं और उन्हें यही लगता है कि महंगे गिफ्ट देना ही अच्छा होता है।
स्कूटर से लेने मत आओ
बड़े स्कूलों में पैसे वालों के बीच में रहने के कारण कई मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे तुलना करने लगते हैं। वे अपने माता-पिता को यह तक कहने लगते हैं कि स्कूल में स्कूटर से लेने मत आया करो दोस्तों के बीच अच्छा नहीं लगता। वहीं धनाढ्य लोगों के बच्चों की कहानी अलग ही है। वहां पर भी यह कहा जाता है कि रोजाना ड्राइवर को एक ही गाड़ी में मत भेजो बल्कि रोज अलग-अलग गाड़ी भेजो ताकि दोस्तों को पता चले कि हमारे पास कितनी गाड़ियां हैं। 
मोबाईल से बिगड़ रही है बात
माता-पिता बच्चों को मोबाईल फोन इंटरनेट कनेक्शन के साथ आठवीं कक्षा से ही देने लगे हैं जिसके कारण समस्या आ रही है। बच्चे अपने तरीके से जो मन में आए वह इंटरनेट पर देखने लगे हैं। लगातार मोबाईल गेम्स खेलने के कारण बच्चे चिड़चिड़े हो गए हैं और बात-बात पर गुस्सा करने लगे हैं
अपनी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है: डॉ.प्रमोद जैन
शिक्षाविद् व पायोनियर समूह के निदेशक डॉ. प्रमोद जैन का कहना है कि मध्यमवर्गीय परिवारों में इस प्रकार की समस्याएं आम होती जा रही हैं। माता-पिता को यह समझना होगा कि बच्चों को केवल पैसा कमाने का लक्ष्य न दें और तुलना बिल्कुल न करें। बच्चों को संस्कार माता-पिता के अलावा कोई भी अच्छी तरह से नहीं दे सकता। उनके साथ समय बिताएं और अपनी संस्कृति में निहित मूल्यों का अर्थ उन्हें बताएं.. पैसों व कोचिंग क्लासेस के माध्यम से इसकी भरपाई नहीं हो सकती। आपने कहा कि किसी भी बच्चें की जिंदगी में उसका स्कूल सबसे महत्वपूर्ण जगह होती जहां से वह संस्कार और ज्ञान दोनों प्राप्त करता है। बच्चों को स्कूल में ऐसा माहौल चाहिए जहां से वह केवल पैसों की अंधी दौड़ और दिखावे की बात नहीं करे बल्कि वह अपनी संस्कृति और संस्कारों को जाने और उनका अनुसरण करे। 
पायोनियर समूह की नई पहल मेरी संस्कृति मेरी शिक्षण पद्धति
पायोनियर समूह के निदेशक डॉ. प्रमोद जैन के अनुसार वर्तमान में शिक्षण पद्धति को हम पायोनियर समूह की सभी शैक्षणिक संस्थाओं में बच्चों के परिवेश के अनुरुप ढालने का प्रयत्न कर रहे है। हमें यह समझना होगा कि बच्चों को केवल भौतिकता की ओर ढकेलने से कुछ प्राप्त नहीं होगा। बच्चों को हमें अपनी संस्कृति और संस्कारों में ढालने के लिए घर से शुरुआत करना होगी। पायोनियर समूह में हम बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों में ढालने का प्रयत्न करते है जिसके अच्छे परिणाम भी सामने आए है। 

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